आरब्ध काव्यकृति लेखक की संवेदना, स्पंदना एवं सर्जना से निस्यंदित शब्दकर्म का निदर्शन है | प्रस्तुत रचनाएँ देशकाल के निस्सीम विस्तार में बह कर, वाक् और अर्थ की अभिन्नता में पक कर, भाव और भाषा की स्पर्धा में उतर कर, विषय और शैली के द्वंद्व में उमगकर, यथार्थ और कल्पित की द्विधा में उग कर रची गयी हैं | कई एक बार तर्क और चातुर्य की राह तज कर आवेग और आवेश का मार्ग चयन किया गया | कठोर जीवन दर्शन का आह्लाद, वेदना की सिसृक्षा, अपकर्ष की तीक्ष्णता एवं नवोन्मेष का औत्सुक्य इनका पाथेय रहा | इस चराचर जगत में विलास करते हुए अंतरात्मा ने जिन तरंगों के कम्पन को गृहीत किया वही वीचि उर्मि कृतित्व में पुनरावर्तित होती रही | साहित्य के शब्दाकाश में ये रचनाएँ कालातीत होकर द्योतित होती रहें एवं भावकों के अंतःकरण में अपूर्वता का उद्रेक करती रहें ऐसी कामना एवं अभीप्सा रहेगी |
दीपांकर कौण्डिल्य ने भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु से भौतिकी में शोध संपन्न किया है | सम्प्रति वे गणित एवं भौतिकी के व्याख्याता के रूप में कार्यरत हैं |
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