टिपटी - हमारे गाँव के घर के मुख्य द्वार के बाहर बना हुआ ऐसा चबूतरा, जहाँ साँझ होते ही गाँव वालों का एक जमावड़ा लग जाता था। यहाँ दिन भर की हुई घटनाओं, राजनीति, शिक्षा, भागवत और न जाने किन-किन विषयों पर चर्चा होती थी। काफी सोचने के बाद मैंने अपनी कहानी संकलन का नाम “टिपटी” इसलिए चुना, क्यूंकि मैं हमारी अगली पीढ़ी के लिए एक ऐसा वैचारिक और भावनात्मक चबूतरा बनाना चाहती हूँ, जहाँ वे कुछ भूली-बिसरि बातों से मेल-जोल कर सकें। यह कहानी संकलन कुछ ऐसे विषयों से उनका परिचय कराने की एक चेष्टा है, जो समय के साथ धूमिल होते जा रहे हैं। यह कहानियाँ कुछ ऐसे अनुभव हैं, जिन्हें जी कर हम जीवन और हमारे देश की कुछ सच्चाईयों को समीप से समझ सकते हैं।
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नूपुर पाठक, जिनकी लेखनी में मध्य-प्रदेश की मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू है, उनका जन्म नर्मदापुरम जिले के ग्राम चतरखेड़ा में हुआ। एक मध्यमवर्गीय किसान पिता और एक शिक्षिका माँ की बेटी होने के कारण, उनके लेखन में जीवन के सरल सत्यों और मानवीय मूल्यों का गहरा समावेश दिखता है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पास ही के छोटे से शहर बानापुरा से हुई, जिसके बाद उन्होंने आई ई एच ई भोपाल से स्नातक और क्राइस्ट यूनिवर्सिटी बेंगलुरु से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वह मुंबई में रहती हैं और बेंगलुरु की एक संस्था में कार्यरत हैं। बचपन में सुनी कहानियों, लोककथाओं और परिवार के बुज़ुर्गों के जीवन अनुभवों ने ही उनके मन में कल्पना के बीज बोए, जो समय के साथ लेखन के रूप में पल्लवित हुए। उनकी रचनाओं में जीवन के सहज क्षणों की गहराई, मानवीय संबंधों की ऊष्मा और एक उज्जवल कल की आशा की किरणें स्पष्ट झलकती हैं। नूपुर का दृढ़ विश्वास है कि बच्चों के लिए लिखना केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि उनके कोमल मन में सही संस्कार, संवेदनशीलता और रचनात्मकता का बीजारोपण करना है। वह हर कहानी को एक सीख, एक मुस्कान और एक गहरी संवेदना के साथ बुनने का प्रयास करती हैं। यह पुस्तक उनके हृदय के अत्यंत करीब है, जिसमें उन्होंने अपने अनुभवों, सपनों और बच्चों के प्रति अपने अटूट स्नेह को शब्दों में पिरोया है। वह आशा करती हैं कि यह रचना न केवल नन्हे पाठकों को, बल्कि बड़ों के मन को भी छूकर उन्हें प्रेरित करेगी।
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