सारे निर्माण असम्पूर्ण हैं जीवन, प्रेम, अकेलेपन, स्मृतियों, घर से दूर होने की पीड़ा और हमारे समय की बेचैनियों पर लिखी गई कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं में नदी, खिड़की, घर, बारिश, शहर, माँ, प्रेम और समय जैसे परिचित अनुभव और भावनाएँ धीरे-धीरे जीवन के बड़े सवालों का रूप ले लेते हैं। यह संग्रह बार-बार इस अनुभूति की ओर लौटता है कि इस संसार में कुछ भी अंतिम या पूर्ण नहीं है— न मनुष्य, न रिश्ते, न समाज, न हमारे सपने। हम सब लगातार बदल रहे हैं, टूट रहे हैं, और फिर स्वयं को नए सिरे से बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कविताओं की भाषा सरल होते हुए भी संवेदनशील है। कहीं उनमें प्रेम है, कहीं उदासी, कहीं समय और समाज को लेकर बेचैनी और आक्रोश, और कहीं जीवन को उसके अधूरेपन के साथ स्वीकार कर लेने की एक शांत, मानवीय दृष्टि। यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो कविता में शोर नहीं, बल्कि एक सच्ची और आत्मीय आवाज़ तलाशते हैं।
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सूर्यस्नात त्रिपाठी (जन्म 1991) एक ओड़िआ कवि और लेखक हैं, जो वर्तमान में आईआईटी रोपड़ के बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। आठ ओड़िआ कविता संग्रहों और एक ओड़िआ लघुकथा संकलन के लेखक सूर्यस्नात ने धर्मवीर भारती जी की महाकाव्य 'कनुप्रिया' का ओड़िआ में अनुवाद भी किया है। 2017 में उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार (ओड़िआ के लिए) से सम्मानित किया गया है । एक नाटककार के रूप में, वे हैदराबाद स्थित थिएटर समूहों 'काश', 'किस्सा गो' और 'प्ले ऑफ शिवा' से जुड़े रहे हैं, जिनके लिए उन्होंने 'बोतल अर्ज़ है', 'लास्ट विश', 'जेनेरेसन्स' और 'न्यूटन' जैसे कई प्रशंसित नाटक लिखे हैं। हाल ही में रिलीज़ हुई ओड़िआ फीचर फिल्म 'इंद्रधनु' सिनेमा निर्माण और पटकथा लेखन में उनका पहला प्रयास है। 'सारे निर्माण असम्पूर्ण हैं' उनकी हिंदी कविताओं के प्रकाशन का पहला अवसर है।
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