ये उन सर्दियों की कहानी है जब दस वर्षीय प्रथम की कल्पना की पतंग की डोर उससे छूट जाती है और उसकी कल्पना अब उसके सपनो में उँड़लने लगती है। ये उन सर्दियों की बात है जब प्रथम के दादाजी का देहांत हो जाता है और उनके घर में प्रथम का बड़ा सा परिवार जमा होता है। ये उन तेरह दिनों की बात है जब छोटे बच्चे भूतों की कहानियों से और बड़े लोग उखड़ी सी बातों से अपना मन बहलाते हैं। प्रथम के दादाजी की विरासत में हैं कुछ ज्ञान की बातें, पीछे बाड़े में पड़ा कुछ सामान और उनके सपने, उन्हें रातों में नींद में आने वाले सपने। कहते हैं के जब कोई गुज़र जाता है तो उनकी आत्मा को परलोक पहुँचने में करीब तेरह दिन लगते हैं, उन तेरह दिनों में उस बेघर आत्मा का घर बन जाते हैं किसी अपने के सपने, प्रथम के सपने।
Mrigtrishna - 2
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