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गुलज़ार साहब की नज़्मों से प्रेरित होकर शौकिया तौर पर लिखी गई आज़ाद नज़्मों, गीतों और गज़लों का यह मजमूआ आपके सामने “ज़माना बदल गया’ के रूप में प्रस्तुत है । दिन-ब-दिन दौड़ती ज़िंदगी और वक़्त की बदलती चाल में हम ज़िंदगी का असली मतलब भूलते जा रहें हैं। आज के दौर में ज़िंदगी जीने का मतलब ज्यादा तरक्की और ज्यादा ऐशो-आराम में सिमट कर रह गया है । कम्फर्ट के लिए जीते-जीते हम असली ज़िंदगी जीना ही भूलते जा रहे हैं ।

 

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हरियाणा के हिसार में जन्में सुनील कुमार केशव स्कूल के दिनों से ही कविताएं पढ़ने और लिखने की रुचि रखते हैं। कॉलेज में आते आते यह रुचि और गहरी होती गई। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूल में एवं अन्नामलाई यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी विषय में स्नातक तक पढाई की । कॉलेज के दिनों में ही गुलज़ार, गालिब और मुनव्वर राना जैसे उर्दू के शायरों से परिचित होने का अवसर मिला। पहले हिन्दी में कविता लिखते थे लेकिन उर्दू से वाक़िफ़ होने पर नज़्मों और गीतों के प्रति प्रेम मन को उत्साहित करने लगा । साहित्य प्रेमी होने के साथ साथ पर्यावरण तथा सामाजिक मुद्दों के प्रति भी उतने ही अग्रसर रहते हैं । जीवन के विभिन्न पहलुओं को बड़ी बारीकी से देखते हुए उनको शब्दकार देना इन्हें बहुत पसंद है।

Daur-E-Kashmakash

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