"अतीत एवं वर्तमान अपृथक्करणीय है,वास्तव में अतीत कही न कही वर्तमान को प्रभावित करता है। यह एक आदर्श कथन नही है। ग्रामीण सामाजिक संस्थाओं एवं मनको ने अपनी पहचान को संरक्षित कर रखा है। किसी विशेष संदर्भ में सामाजिक संस्थाओं का अध्ययन करते समय यह सीमा निर्धारित करना कठिन है कि कब अतीत का अंत होता है और कब वर्तमान प्रारंभ हुआ, यह न केवल यांत्रिकी सततता ( Mechanical continuity) है वरन एक दृढ़ तत्त्व है जो अतीत का सोचा-समझा संरक्षण करता है। सामाजिक संस्थायें, सामाजिक मानक ,लोक संस्कृति और सिद्धात सामाजिक संरचना को नियंत्रित करते है; इन्होंने सामाजिक संस्थाओं के गतिशील एवं आकस्मिक रूप को स्पष्ट किया है। वर्तमान अतीत का वाहक होता है; वर्तमान में भविष्य के परिवर्तनों की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है । इस प्रकार यह समय विमाओं (Time Dimension) का त्रिभुज है, जिस पर सामाजिक संस्थाओं के समझने की आवश्यकता है। यह पुस्तक, उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार का ग्रामीण समुदाय पर प्रभाव का आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह अध्ययन दो भागों में विभाजित है; प्रथम तीन अध्याय उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार के अधिनियमों के अधिनियमित होने एवं क्रियान्वयन से संबंधित हैं, जबकि द्वितीय भाग के तीन अध्याय उत्तर प्रदेश में भूमि सुधार का ग्रामीण समुदाय पर प्रभाव से संबंधित है। इस पुस्तक में भूमि सुधार को एक सामाजिक नीति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है।
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जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा बिहार में सहायक प्रोफेसर, देवरिया जनपद के नोनापर निवासी डॉ. रितेश्वर नाथ तिवारी की प्रारंभिक शिक्षा देवरिया के सरस्वती विद्या मंदिर और राजकीय इंटर कॉलेज से हुई है। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय(BHU) से इतिहास विषय मे स्नातक, स्नाकोत्तर और शोध की उपाधि प्राप्त की है। स्नाकोत्तर(इतिहास) की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने पर उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था। आप ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास की है। आप भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के शोध अध्येता रहे हैं। आपको बिहार के तात्कालिक राज्यपाल और वर्तमान महामहिम राष्ट्पति द्वारा सास्वत सम्मान से 2016 में सम्मानित किया जा चुका है। आपके 10 से अधिक शोध पत्र विभिन्न अंर्तराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

