इस पुस्तक का बीज किसी पुस्तकालय में नहीं, बल्कि एक सामूहिक साधना के उस पावन क्षण में पड़ा, जब हम सब एक स्वर होकर श्री ललिता सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे। वायुमंडल नामों की गूँज से भर उठता, हर कंठ श्रद्धा से काँपता — और उसी बहते हुए भक्ति-प्रवाह के बीच मेरे हृदय में एक कोमल-सी टीस उठी: हम माँ के इन दिव्य नामों का उच्चारण तो कर रहे हैं, पर क्या हमारा हृदय उनका सच्चा अर्थ, उनकी अपार महिमा भी छू पा रहा है? या हम केवल इसलिए इस धारा में बह रहे हैं क्योंकि सामने बैठे साधक भी वही कर रहे हैं — शब्दों के मर्म से, उनके शुद्ध स्वर से, उनमें छिपे माँ के संदेश से अनजान?
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गौरव पिछले 25 वर्षों से बैंकिंग सूचना प्रौद्योगिकी में काम कर रहे हैं । गौरव को बचपन से ही गीता प्रेस की किताबें और कॉमिक्स पढ़ना पसंद था और उनके पिता को भी लिखना पसंद था। लेखन उनके लिए लंबे समय से प्रतीक्षित जुनून था। वह लंबे समय से एक उपन्यास लिखने के बारे में सोच रहे थे और आखिरकार उसे पूरा कर ही लिया।
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