यह पुस्तक एक शिक्षक के 10–12 वर्षों के शिक्षण के अनुभवों, प्रयोगों और उन पर किए गए गहन चिंतन का सार है। किताब में वर्णित प्रमाणिक घटनाओं का अत्यंत बारीकी से, एक उपन्यास की शैली में चित्रण किया गया है, जिससे पाठक केवल पढ़ता नहीं बल्कि उन परिस्थितियों को महसूस भी करता है। पुस्तक के कई अध्याय निबंधात्मक हैं, जहाँ शिक्षा, बच्चों, शिक्षक और आधुनिक स्कूल व्यवस्था पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्भीकता है। इसमें आज की शिक्षा व्यवस्था पर तीखे प्रश्न उठाए गए हैं—रटंत संस्कृति, परीक्षा की अनिवार्यता, बच्चों की जिज्ञासा का दमन, शिक्षा का बाज़ारीकरण और स्कूलों का जेल जैसा वातावरण।
Shikshak Hone Ka Arth
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