"शिक्षक होने का अर्थ’ सिर्फ एक शिक्षक की आपबीती या संस्मरण नहीं, बल्कि कक्षा, बच्चों और शिक्षा-व्यवस्था को भीतर से समझने की एक कोशिश है। वर्षों के शिक्षण अनुभवों के आधार पर लेखक ने अनुशासन, गृहकार्य, परीक्षा, रटने की संस्कृति, बच्चों की जिज्ञासा, शिक्षक-विद्यार्थी संबंध, पक्षपात और ‘नो-टच पॉलिसी’ जैसे कई अहम सवालों पर गहन चिंतन किया है। अपने अनुभवों के साथ शिक्षा जगत में हुए विभिन्न शोधों का उल्लेख करते हुए और शिक्षा की विभिन्न विचारधाराओं का मूल्यांकन करते हुए यह पुस्तक शिक्षा से जुड़े कई अहम पहलुओं को एक अलग नज़र से देखने की कोशिश करती है।
यह किसी एक सिद्धांत को अंतिम सच मानकर नहीं चलती, बल्कि शिक्षक और अभिभावकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि आख़िर शिक्षा का असल मक़सद क्या है और एक शिक्षक होने का अर्थ क्या है।"
Shikshak Hone Ka Arth
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