"मिट्टी में दबे बीज” सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता का दुर्लभ संगम है, जो मानवीय अंतःसंघर्ष और मौन को सजीव स्वर देता है; यहाँ घटनाओं से अधिक भावों की प्रधानता है, जहाँ रिश्तों की जटिल परतों के साथ आधुनिक जीवन के भय और प्रेम को गहन आत्मीयता से उकेरा गया है, और कहानियाँ नैतिकता, अपराध तथा प्रायश्चित के बीच डोलती आत्मा की पुकार को सरल किंतु मर्मस्पर्शी भाषा में व्यक्त करती हैं; यह कृति पाठक को बाहरी शोर से हटाकर भीतर घटते सूक्ष्म परिवर्तनों से परिचित कराती है, जो जीवन के वास्तविक दर्शन को उजागर करते हैं, और अंततः ठहरकर सोचने तथा स्वयं से संवाद करने की गहरी प्रेरणा प्रदान करती है।"
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प्रदीप सिन्हा का जन्म 21 जून, 1961 को सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में हुआ। आईआईटी (IIT) रुड़की और आईआईटी (IIT) मद्रास से उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने लंदन के इम्पीरियल कॉलेज से ' लीडरशिप इन सस्टेनेबिलिटी ' में विशेषज्ञता हासिल की। 35 वर्षों से अधिक समय तक 'टेरी' (TERI) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में निदेशक और विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत रहने के बाद, वर्तमान में वे नई दिल्ली में वरिष्ठ सलाहकार हैं। व्यावसायिक जीवन में जहाँ वे हरित भवन और ऊर्जा प्रबंधन के तकनीकी पक्ष को संवारते हैं, वहीं साहित्य के क्षेत्र में वे मानवीय संवेदनाओं के सूक्ष्म चितेरे हैं। 'दबे होंठों से' और 'With Lips Compressed' के बाद, उनकी नवीनतम कृति 'मिट्टी में दबे बीज' आधुनिक जीवन की विसंगतियों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को एक सजग और संवेदनशील दृष्टि से स्वर देती है।

