सब जीना चाहते हैं अपने पसंद की जिंदगी। हर कोई के पास जीवन जीने का कुछ मकसद होता है और होता है– 'बहुत सारी ख्वाहिशें'। पर क्या होगा अगर हमें ऐसी आजादी बिना लड़े ही मिल जाए? ऐसी आजादी के बाद जीवन कैसा होता होगा? ऐसे ही तमाम सवालों को कुरेदती है यह शालू की कहानी। कभी बंदिशों के डोर में कसकर बंधा रहना न सही पर उस डोर में लिपटे रहना जरूरी होता है। उस डोर से आजाद होकर जीवन का मोल बिल्कुल वैसे ही हो जाता है जैसे अंगूर के लच्छे से दानों के टूट जाने से। हर वक्त खुशहाल जीवन के लिए मनमर्जी जरूरी नहीं, कभी सूझ–बुझ को समझदारी के पलड़े में तौलकर, जिम्मेदारी को दायित्व के आईने में परखकर और शुभचिंतकों के धुंधले उमंगों को ख्याल में रखकर निर्णय लेना पड़ता है।
Mann Marzi
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