पचास बरस पहले जहाँ अमीर-ग़रीब, ताकतवर-कमजोर के बीच दस और नब्बे का फ़र्क़ था, आज भी तीस और सत्तर का तो है ही। मगर सामाजिक ताने-बाने की सोच में ज़बरदस्त अंतर यह आया कि आज ग़रीब को अमीर बनने या कमजोर को ताकतवर बनने के आसान अवसर हैं। आज भारतीय समाज में कोई वर्ग दबा कुचला लाचार नहीं है और न ही वो पुश्तैनी औरत आज सिमटी, सहमी, शर्मीली है। इसलिए आधुनिक कविताओं में सामाजिक और जनवादी स्वर का अभाव है।
श्रीधर की कविताएं उस नब्ज़ को पकड़ती हैं, जहाँ कम रचनाकारों की संवेदनाएं जाती हैं। उनके लिए नए दौर में नया जनवाद है, नई चुनौतियाँ हैं, अलग किस्म के आक्रोश हैं, सो, आज भी उनकी कविताओं में साम्यवाद और समाजवाद की तीव्रता रहती है। वे कहीं निहायत श्रृंगार लिखते हैं, नारी के बदन, नयन, गेसू, कंगन, आँगन पर खुलकर फ़िदा मिलतेे हैं, वहीं इंसानी बदहालियों, सामाजिक बुराईयों, राजनैतिक विकलांगताओं पर करारा चोट करते हैं। आपको ‘अंतर्द्वन्द्व’ की कविताएं, सभी रंगों के फूलों का गुलदस्ता महसूस होंगी।
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