“हर घर में दो तरह की आवाज़ें होती हैं—एक जो दिन में सुनाई देती हैं, और दूसरी वे जो दरवाज़े बंद होने के बाद आती हैं।” जबलपुर की एक सरकारी कॉलोनी में, दस साल का आरू एक ऐसी आवाज़ सुन लेता है जिसका नाम कोई नहीं लेता। एक कुंडी की ‘चट्’—और उसके बाद सब कुछ बदल जाता है। माँ का संगीत अब वैसा नहीं रहता। पिता की चुप्पी और भारी हो जाती है। और आरू के भीतर एक ऐसा डर जन्म लेता है जो उसके साथ बड़ा होता है। सालों बाद, वही लड़का अर्विंद बन चुका है—पर उस बंद दरवाज़े के बाहर बैठा बच्चा अब भी उसके भीतर ज़िंदा है। ‘एडल्ट चाइल्ड’ एक आदमी की उस बच्चे तक लौटने की कहानी है—जिसे उसने कभी पीछे छोड़ दिया था।
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मणि कृष्ण वर्मा मुंबई में रहते हैं और प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन से जुड़े क्षेत्र में कार्यरत हैं। साहित्य में उनकी पहली कृति ‘तेरहवाँ दिन’ राजमंगल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी है। ‘एडल्ट चाइल्ड — अर्विंद’ उनका दूसरा उपन्यास है — एक ऐसी मनोवैज्ञानिक कथा, जो बचपन के अनुभवों, भावनात्मक स्मृतियों और पुरुष के भीतरी संसार की जटिलताओं को केंद्र में रखती है। वह ‘Whisper of Dharma’ और ‘Titli’ YouTube channels के माध्यम से भक्ति और बाल-शिक्षा से संबंधित सामग्री भी प्रस्तुत करते हैं।

