धूप किनारे डायरी की तरह खुलने वाली एक शांत कथा है। इसमें एक उम्रदराज़ चित्रकार की ढलती यादें हैं, एक युवा डॉक्टर की भीतर सिमटी उलझनें, और उनके बीच बनता वह संवाद जो बिना मिले ही गहरा होता चला जाता है। यह कहानी बड़े मोड़ों की नहीं, बल्कि उन पलों की है जहाँ जीवन ठहरकर खुद को देखता है—शहर की गलियाँ, अस्पताल के वार्ड, और कैनवस पर उतरती हल्की धूप मिलकर उस दुनिया को रचते हैं जहाँ रिश्ते बोले बिना समझे जाते हैं। धूप किनारे उन सभी के लिए है जो तेज़ कथानकों से अधिक, धीरे-धीरे खुलती कहानियों में भरोसा रखते हैं—और जो जानते हैं कि कुछ मुलाक़ातें शब्दों में नहीं, सिर्फ़ ख़ामोशी में पूरी होती हैं।
Dhoop Kinare
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