“छोड़ जाते हो तुम जब भी मुझे... मेरे हृदय को चुभता है।
‘देवालिका’ पूर्व में उत्तर भारत के मध्य स्थित शेषालय राज्य की राजकुमारी दिवा की प्रेम कहानी है। जिसे काशी के राजकुमार धनंजय से प्रेम हुआ। परन्तु मगध के शक्तिशाली राजा दुर्जय सिंह को उनका प्रेम रास न आया। कहा जाता है कि दुर्जय के पास सौ अश्वों का शारीरिक बल था। जिसे किसी भी युद्ध में पराजित करना लगभग असम्भव था। दुर्जय ne भरे स्वयंवर से दिवा का हरण कर लिया और बलपूर्वक मगध ले आया।
दिवा और धनंजय का प्रेम यहीं समाप्त नहीं हुआ बल्कि वास्तविक कहानी यहीं से प्रारम्भ हुई। दिवा के हरण के पश्चात् काशी और मगध के बीच महा प्रलयंकारी युद्ध हुआ, जो लगातार नौ दिन तक चल। जिसमें भारत के प्रमुख राज्यों ने हिस्सा लिया। ये कथा धनुर्धारी अमृत्य और यदुवंशज माधव की कहानी भी कहती है।
देवालिका में युद्ध के प्रत्येक दिन का सजीव वर्णन और प्रयोग किये गये अस्त्रों-शस्त्रों की जानकारी बखूबी दी गई है। कथा के प्रमुख बिंदु अमृत्य का धनुर्कौशल, दुर्जय की दुर्जयता, दिवा की सुन्दरता और माधव की कूटनीति हैं। ये कथा हमें राजवंश की ओर ले जाती है। कथा के कुछ हिस्से भगवान परशुराम और अश्वस्थामा से जुड़े हैं तथा प्रथम अध्याय उन्हीं से शुरू हुआ ।
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युवा लेखक लक्ष्मीकान्त शुक्ल मूल रूप से कानपुर उ.प्र. के रहने वाले हैं। उनका जन्म 24 फरवरी को घाटमपुर कानपुर में हुआ था। लेखन के क्षेत्र में वे बचपन से ही सक्रिय रहे हैं। विभिन्न मंचो एवं साहित्यिक गतिविधियों पर कवि एवं वक्ता के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। देश के प्रमुख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में कॉलम लिखना उनका शौक है। सया, ब्लास्ट, 5 शेड्स ऑफ़ लव एवं ‘तेरे ही लिए’ उनकी प्रमुख कृतियाँ है, जो आज पाठको का मनोरंजन कर रही है। वर्तमान में श्री शुक्ल उ.प्र. सरकार में सेवारत हैं एवं साहित्यिक सेवा सुचारू रूप से कर रहे हैं। शुक्ल जी फिल्म राइटर एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य हैं। उनकी एक खूबी यह भी है कि वे दोनो हाथों से लिखते हैं।
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